न जाने कब से हैं सहरा कई बसाए हुए
हुई हैं मुद्दतें, आंखों को मुस्कुराए हुए
ये माहताब न होता, तो आसमानों पर
सितारे आते नज़र और टिमटिमाए हुए
समंदरों की भी नश्वो-नुमा हुई होगी
ज़माना राज़ ये सीने में है छुपाए हुए
हर एक दिल में खलिश क्यों है एक मुब्हम सी
नक़ाब चेहरे से है वक्त क्यों हटाए हुए
इस इंतज़ार में आयेंगे फिर नए पत्ते
शजर को अरसा हुआ पत्तियां गिराए हुए
हवा के झोंकों में हलकी सी एक खुश्बू है
तुम आज लगता है इस शहर में हो आए हुए
गुलाब-रंग कोई चेहरा अब कहीं भी नहीं
ज़मीं पे अब्र के टुकड़े हैं सिर्फ़ छाए हुए
लगे हैं ज़ख्म कई दिल पे संगबारी में
के लोग सर पे हैं तूफ़ान सा उठाए हुए
किताबें पढ़के नहीं होती अब कोई तहरीक
जुमूद अपने क़दम इनमें है जमाए हुए
परिंदे जाके बलंदी पे, लौट आते हैं
के इन के दिल हैं नशेमन से लौ लगाए हुए
अजीब थे वो मुसाफ़िर, चले गए चुपचाप
दिलों में अब भी कहीं हैं मगर समाए हुए
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Love Shayari in Hindi_Tere hotho pe mere naam
तेरे होठों पे मेरे नाम का फूल खिल जाए
तो कहाँ जायेगा मेरा ध्यान इस जहां की तरफ
फिर चाहे मेरे हाथ से ये मंजिल जाए
कदम खुद चल पड़ेंगे तेरे इक सदा की तरफ
मुझे याद है वो सब तेरी यादों की कसम
वो इक अदा से हँस के मेरा नाम लेना
वो सख्त राहों पे जब लडखडाते थे कदम
मई साथ हूँ ये कह के हाथ थाम लेना
मैं कैसे मान लूँ की अब तू मेरे साथ नहीं
तू जब तब छू जाए मुझे हवाओं की तरह
क्या हुआ जो अब इन हाथो में वो हाथ नहीं
तेरी यादें तो मेरे साथ हैं दुआओं की तरह
तू मुझे भूलने की दुआ भी करे , ऐ यार
तो भी मुझे ज़माने भर की ख़ुशी मिल जाए
की वो दुआ करने में ही सही , 'मितवा' फिर इक बार
तेरे होठों पे मेरे नाम का फूल खिल जाए
तो कहाँ जायेगा मेरा ध्यान इस जहां की तरफ
फिर चाहे मेरे हाथ से ये मंजिल जाए
कदम खुद चल पड़ेंगे तेरे इक सदा की तरफ
मुझे याद है वो सब तेरी यादों की कसम
वो इक अदा से हँस के मेरा नाम लेना
वो सख्त राहों पे जब लडखडाते थे कदम
मई साथ हूँ ये कह के हाथ थाम लेना
मैं कैसे मान लूँ की अब तू मेरे साथ नहीं
तू जब तब छू जाए मुझे हवाओं की तरह
क्या हुआ जो अब इन हाथो में वो हाथ नहीं
तेरी यादें तो मेरे साथ हैं दुआओं की तरह
तू मुझे भूलने की दुआ भी करे , ऐ यार
तो भी मुझे ज़माने भर की ख़ुशी मिल जाए
की वो दुआ करने में ही सही , 'मितवा' फिर इक बार
तेरे होठों पे मेरे नाम का फूल खिल जाए
Hindi Love Shayari
जब दिल ने कुछ कहना चाहा , जुबां न मिली
जुबां ने कुछ कहना चाहा , दास्ताँ न मिली
ऐसा नहीं है की इस जहां में मुहब्बत ही नहीं
बस जहाँ पे मैंने पाना चाहा , वहाँ न मिली
मैंने साथ माँगा उसका और उसने जुदाई
मैं मना न कर सका उसकी हाँ न मिली
देखा तो 'मितवा' मीलों का फासला देखा
सोचा तो कोई दूरी दरमियाँ न मिली
जुबां ने कुछ कहना चाहा , दास्ताँ न मिली
ऐसा नहीं है की इस जहां में मुहब्बत ही नहीं
बस जहाँ पे मैंने पाना चाहा , वहाँ न मिली
मैंने साथ माँगा उसका और उसने जुदाई
मैं मना न कर सका उसकी हाँ न मिली
देखा तो 'मितवा' मीलों का फासला देखा
सोचा तो कोई दूरी दरमियाँ न मिली
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